रविवार, 1 मार्च 2020


                                                         स्मृतियों में पिता


          
.........बाद में, भाई बता रहा था कि सरकारी अस्पताल के उस जनरल वार्ड में जब बाउजी(पिताजी) की सांसे कम होती जा रही थी तो प्राण निकलते वक्त वह मुझे ही देख रहे थे. मुझे ठीक-ठीक याद नहीं आ रहा कि मैं उस वक्त क्या देख रहा था......क्या मै ई.सी.जी.मशीन पर नीचे-ऊपर होने वाली उस लाइन को देख रहा था जो ऊपर-नीचे होती हुई एकदम से सीधी हो गई थी ...क्या मैं उनके चेहरे पर अचानक उभरे दर्द के उस भाव को देख रहा था जो भाई के बताये अनुसार वैसा ही था जैसा उसने दादाजी की मृत्यु के समय उनके चेहरे पर देखा था. ......क्या मैं उस डाक्टर को देख रहा था जो आखिरी वक्त में भी उनकी सांसे वापिस लाने की जी-तोड़ कोशिश कर रहा था......क्या मैं उनके स्थिर पड़ते चेहरे को देख रहा था जो पल भर पहले डाक्टर की विजिट से पहले बिल्कुल सामान्य लग रहा था......  
       मैंने जब से होश संभाला तब से मुझे बाउजी को साल में दो महीने ही देखने का सौभाग्य मिलता था. केन्द्र सरकार की नौकरी में रहने के कारण हर साल वह दो महीने के वार्षिक अवकाश पर ही घर आते थे. इन दो महीनों में भी उनकी मसरूफियत और मेरे बचकाने डर और झिझक के कारण उनसे सामना कम ही होता था. मेरा सारा बचपन बाउजी के साथ इसी तरह से बीता था. 1986 में मेरे राजकीय महाविद्यालय अजमेर में प्रवेश के समय वह दीमापुर नागालैण्ड में पदस्थापित थे. उन्होंने अपने अधिकारियों को प्रार्थना पत्र दिया था कि मेरा बच्चा अजमेर में पढ़ रहा है इस वजह से मेरा स्थानान्तरण अजमेर कर दिया जाये. उस प्रार्थना पत्र पर समुचित कार्यवाही 3 सालों के बाद हुई जब तक में स्नातक परीक्षा उत्तीर्ण कर चुका था. 1989 में वह अजमेर आये और सेवा निवृत्ति तक वहीं पदस्थापित रहे. इसी दौरान स्नातकोत्तर के दो और एम. फिल. के आधे सत्र तक उनके साथ रहने का सौभाग्य मिला. यह साथ रहना पिता-पुत्र के रिश्ते के लिए अमूल्य धरोहर थी. इसी साथ रहने में मैंने पहली बार उनके साथ खूब समय बिताया. जी भर कर बातें की. बातें उनसे बहुत सारी होती थी, जब हम अकेले होते थे और फुरसत में होते थे तो हमारी बातें ही खत्म नहीं होती थी. घर, परिवार, जाति, समाज, सब की बाते होती थी.
       उनका जन्म सरकारी दस्तावेजों में 1942 का लिखा हुआ था पर वह खुद मानते थे कि उनका जन्म 1942 में नहीं बल्कि 1940 में हुआ होगा. मेरे सवाल उठाने पर उनका जवाब यह था कि-मैंने 1947 के बाद देवली जो कि ब्रिटिश भारत में छावनी एरिया रहा था से गोरे लाल मुँह जैसे अंग्रेजों को वापिस अपने देश के लिए रवाना होते देखा था, हम बच्चे देखने गये थे कि कैसे अंग्रेज अपनी पीठ पर पिटठू बांधकर जा रहे थे.और उनके हिसाब से 5 साल के बच्चे की स्मृतियाँ इतनी सुदीर्घ नहीं होती कि वह इन बातों को इतने लम्बे समय तक याद रख सके इसलिए वह अपना जन्म 1940 का मानते थे. जैसा वह बताते थे उसके अनुसार उनका बचपन अभावों और गरीबी में ही बीता था. खेती, किसानी, मजदूरी, पलदारी करते हुए वह गांव में ही काम करते रहे. फिर वहीं सी.आर.पी.एफ. में लांगरी के तौर पर भर्ती हो गये. गरीबी और अभावों में पांचवी कक्षा तक पढे आदमी को जो काम मिल सकता था वह काम उनको मिल गया था. उनके पास एक वही एक छोटी सी सरकारी नौकरी बनी रही जिसके दम पर उन्होंने पूरा परिवार संभाल लिया था. यह भी एक अच्छा संयोग ही था कि मेरा जन्म और उनकी राजकीय सेवा का वर्ष 1969 ही रहा. 1977 में, वह देवली से सी.आर.पी.एफ. सेन्टर के गांधीनगर स्थानांतरित होने तक वहीं पर अपनी सेवायें देते रहे, फिर उनको वहाँ से गांधीनगर जाना पड़ा. गांधीनगर के बाद बाउजी स्थानान्तरित होकर दीमापुर (नागालैण्ड) गये और दीमापुर से फिर अजमेर.
     अजमेर में सी.आर.पी.एफ. के अस्पताल में सब उन्हें भोलेबाबाके नाम से जानते थे. क्योंकि वह किसी से भी मिलने पर सम्बोधन के नाम और कुछ कहने के बजाय जय भोले कीही कहते थे. यहाँ तक कि बाद के दिनों में तो वह जब उस अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधिकारी के सामने भी किसी काम से जाते थे तो जय भोले कीही बोलते थे और हैरत की बात यह थी कि जवाब में उन्हें वहाँ से भी जय भोले कीही मिल जाता था. कद में या पद में, चाहे बडा हो या छोटा, सामान्य रूप से किये गए अभिवादन के जवाब में उनके मुंह से जय भोले कीही निकलता था. इसी स्वभाव और आदत के कारण सी.आर.पी.एफ., जी.सी.-1 के अस्पताल के बगल में बने शिव मन्दिर के वह अघोषित पुजारी मान लिये थे. रामायण पढ़ने का उनको बहुत चाव थारामचरित मानस उन्हें पूरी तरह से रटी हुई थी. बातों-बातों में उसकी चोपाइयों से वह बातचीत के स्तर को आध्यात्मिक स्तर तक उठा देते थे. ईश्वर के प्रति उनका यह लगाव और धार्मिक स्वभाव जो कि बचपन से था, उनकी सेवा निवृत्ति तक बना रहा. सेवा निवृति के बाद में पहले सबसे बडे़ बेटे और पांच साल बाद सबसे लाडले छोटे बेटे को खोने के बाद उनका विश्वास हर देवी देवता से उठ गया था.वह भयंकर रूप से नास्तिक हो गये थे. उन्होंने सारे देवी-देवता उठाकर ताक पर रख दिये थे. इन हादसों के बाद कायम उनकी यह नास्तिकता और देवी-देवतावों से विरक्ति अंत तक बनी रही.
       अपने सम्पूर्ण सेवा काल के दौरान ऐसा कोई भी सरकारी लोन नहीं था जो सरकार से उनको मिल सकता था और उन्होंने लिया नहीं था. फेस्टिवेल एडवांस, फूड ग्रेन एडवांस, जीपीएफ का अस्थाई लोन उनके आय बढ़ाने के अस्थाई साधन हुआ करते थे. एक प्रकार से उनका लगभग सारा जीपीएफ हम बच्चों की पढ़ाई में ही लग गया था. उनके कमांडिंग आफिसर तक उनकी इस आदत के कारण परेशान रहते थे. वह जब भी किसी लोन के लिए अप्लाई करते तो इनका कारण एकमात्र यही होता था कि मेरे बच्चे पढ़ रहे है, जो कि सबको बहाना ही लगता था. कोई उस दफ्तर में यकीन कर ही नहीं सकता था कि इनका कोई बच्चा पढ़ता भी होगा और वह भी उस शहर के सबसे बड़े महाविद्यालय की सबसे बड़ी कक्षा में. उनके सहकर्मियों व अधिकारियों की यह गलतफहमी तब टूटी जब केन्द्रीय पुलिस संगठन के द्वारा सी.आर.पी.एफ./बी.एस.एफ./आइ.टी.बी.पी. में डिप्टी कमांडेंट व डी.एसपी. की सीधी भर्ती की लिखित परीक्षा उत्तीर्ण अभ्यर्थीयों की सूची किसी बहाने से वहाँ के मुख्य चिकित्साधिकारी तक पहुंची. पता नहीं किस नियम के तहत गयी पर जी.सी.-1 अजमेर में कार्यरत कर्मचारियों के आश्रितों में से उस परीक्षा में उत्तीर्ण अभ्यर्थीयों की वह सूची अधिकारियों तक पहुंच गयी थी. इस सूची में मेरा भी नाम था क्योंकि उस समय किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में स्थानीय पते के नाम पर मैं 22/1, सी.आर.पी.एफ. क्वार्टर कोलोनी, जी.सी.-1 अजमेर ही लिखता था. यह लिखित परीक्षा मैंने 1991 में स्नातकोत्तर परीक्षा के दौरान पास की थी. उस परीक्षा में फिजीकल और मेडिकल में मेरा चयन क्यों नहीं हुआ यह अलग लेख की बात है. हाँ इतना जरूर हुआ कि अब लोगों के देखने का नजरिया बाउजी के प्रति काफी बदल गया था. वरना होस्पीटल मेस के हेड कुक के जिस पद पर वह कार्यरत थे उनके सहकर्मियों की निगाह में पढ़ना और अपने बच्चों को पढ़ाना एक प्रकार की फिजूलखर्ची थी. जैसे-तैसे दसवीं या बारहवी कक्षा के बाद सिपाही के पद पर भर्ती हो जाना उनके साथियों के बच्चों का एक मात्र सपना हुआ करता था. ऐसे माहौल में मुझे लेकर बाउजी अतिरिक्त सतर्क रहा करते थे. कोशिश करते थे कि मैं उनके सहकर्मियों की बातों में या प्रभाव में ना आ जाउं. एक तरीके से कहूँ तो वह मुझे साही के दस्तानों में पाल रहे थे.
       उस समय प्रति वर्ष राजकीय महाविद्यालयों में व्याख्याता पद पर मेरिट के आधार पर पूर्णतया अस्थाई नियुक्तियाँ की जाती थी. राजकीय महाविद्यालय अजमेर से एम. फिल. करने के दौरान ही मैंने भी इस पद के लिये आवेदन किया था. एम.एससी. में प्रथम श्रेणी के कारण मेरा चयन पूर्णतया अस्थाई तौर पर व्याख्याता पद पर हो गया था. 1992 के जनवरी माह के अन्त में मुझे ज्वाइन करने सरदारशहर जाना था पर जाने से पहले पिताजी से जमकर बहस हुई थी. वह कह रहे थे नौकरी पर जाने से पहले मुझे अपनी पढ़ाई पूरी करनी चाहिए. नौकरी तो फिर भी लग जायेगी पर एक बार पढ़ाई छूट गयी तो फिर नहीं हो पायेगी. वह मुझ से कह रहे थे कि-'आप ही तो कहते हो कि सत्रहवीं क्लास(वह एम.फिल. का मतलब यही समझते थे) के बाद कोई क्लास नहीं होती तो इस आखिरी क्लास को अधूरे छोड़ कर जाने में क्या समझदारी है ?'  मैं अपने पूरे प्रयत्नों के बाद भी उनको यह समझाने में सफल नहीं हो पा रहा था कि इस कक्षा के बाद भी मुझे मिलना यही पद है जो इस कक्षा के दौरान ही मिल रहा है तो फिर इस पद पर ज्वाइन करने में क्या बुराई है. वह अपनी जिद पर अड़े थे, मैं अपनी पर. मैं उनके मना करने के बावजूद भी एम.फिल. अधुरी छोड़कर राजकीय सेवा में चला गया था. बाद मे अहसास हुआ कि एक तरीके से उनका कहना सही ही था, पूर्णतया अस्थाई राजकीय सेवा भले ही पूर्णतया स्थाई में परिवर्तित हो गई थी पर मुझे आज भी कभी-कभी दुख होता है कि उसके बाद एम.फिल कभी पूरी ही नहीं हो सकी.
       होता यही था कि वह अपनी बात कहते थे पर उनके अनुसार ही सब हो ऐसा कोई आदेश वह नहीं देते थे. उस समय तक मेरे पढ़ने को शायद वह ज्यादा तवज्जो देने लग गये थे इसी कारण मान लेते थे कि यह कह रहा है तो सही ही कह रहा होगा. उनके कहे को मानना न मानना वह मेरी इच्छा पर छोड़ देते थे. उन्होंने कभी मेरे पर कोई पाबन्दी नहीं लगाई थी. तब मेरी जवानी के दिन थे. हर परंपरा को तोड़ने और बंधे-बंधाये रास्तों से हटकर जीने और दिखने की ललक में, मैं कभी बाल कटा लेता तो कभी दाढ़ी बढ़ा लेता था. कभी मूंछे उगा लेता तो कभी सिर मुंडा लेता था. एक बार मैंने किसी को उनसे यह कहते हुए सुना भी था कि-आप अपने बेटे को मना क्यों नहीं करते जो आपके जिन्दा रहते ही अपने बाल कटा कर घूम रहा है.उनका जवाब था कि-यह अपनी गर्दन नहीं कटा रहा है यही इसकी हम पर बहुत बड़ी मेहरबानी है.क्या यह कहकर बाउजी ने मुझे जता और बता दिया था कि मैं किन बेवकूफियों में उलझा हुआ हूँ. क्या वह छोटे से गांव के गरीब परिवार और सामाजिक श्रेणीबद्धता के निम्नतम स्तर से निकल कर शहर के सबसे सभ्रान्त शैक्षणिक परिवेश में अपने अस्तित्व को खोजने और स्वंय को स्थापित करने के लिए उजड्ड और गंवार से दिखने वाले बालक से इससे कुछ बेहतर और बड़ा करने की उम्मीद कर रहे थे. क्या उस दौर में मेरी हर उल्टी-सीधी हरकत को स्वीकारना मुझे अहसास करवाना ही था कि इस लाले की जान कितनी कीमती है और इसमें कितनों की सांसे बसी है. बाद में ईश्वर से विरक्ति के दौर में उन्होंने लम्बे समय तक बाल और दाढ़ी बढ़ा ली. घने बालों और दाढ़ी में वह साधु-संत ही नजर आते. उनको मिली भोले बाबाकी उपाधि भी अब सार्थक लगने लगी थी क्योंकि उस हुलिए में वह पूरे बाबा ही लगते थे. उस समय बेगमने एक दिन मुझसे कह ही दिया कि-बाउजी से कहो ! ऐसे क्या जटाधारी बनकर घुम रहे है, बुरे लगते हैं,  बाउजी से कहिये कि बाल और  दाढ़ी कटवा लें.मैंने बेगमको समझाया कि ऐसे कहने की हमारे घर में कोई परम्परा नहीं है. न इन्होनें कभी मुझे कहा था और न मैं इनसे कहूंगा.
       बीडी पीना उनके स्वभाव में था और वह मना करने के बाद भी पीते थे. हाँ, इतना लिहाज वह कर लेते थे कि मेरे सामने नहीं पीते थे. कभी-कभी तो इस आदत की वजह से उनको नजरें भी चुरानी पड़ जाती थी जब उनका कोई हमउम्र उनके सामने ही बीड़ी जलाकर उनको पेश कर देता था और वह इशारों से उसे मना करते थे कि मैं बैठा हूँ वह उन्हें नहीं दे. कभी सामने वाला इन इशारों को समझ भी नहीं पाता था और उनके सामने बीडी बढ़ा देता था तो उनको बुरा लगता था. ऐसे समय में वह या तो सामने वाले पर नाराज होते थे या मना कर देते थे. पर उनकी इस कशमकश को मैं समझ गया था इसलिए ऐसे अवसर पर उनको बुरा नहीं लगे इस वजह से मैं उनके सामने से हट जाता था. अकेले मैं मुझे जब भी मौका मिलता, मैं उनको इस बात के लिए मना करता पर मेरे मना करने या कहें कि टोकने के कारण इस बारे में बात करते समय वह मेरे से नजरें चुराने लग जाते. बात को घुमा देते क्योंकि मेरा इस तरीके से बोलना शायद उनको अच्छा नहीं लगता था. बाद मैं मैंने इस बारे में उनसे बात करना बन्द कर दिया था और अपने आप को समझा लिया था कि बाउजी जब लम्बे समय से ऐसा कर रहे हैं तो मेरे कहने से अब इस उम्र में क्या खाक मुसलमां होंगें. उनकी इस आदत को मैंने स्वीकार लिया था. उन्हें इसी आदत के साथ स्वीकार करना और इसकी वजह से उनके स्वास्थ्य के बारे में चिंता करना पिता-पुत्र के रिश्तों की जरूरत थी. मेरे साथी व्याख्याताओं में से मैं ही नहीं अनेक इन्हीं दुःखों के मारे थे. हममें से कोई यदि स्वर्गीय पिताजी को याद करता भी था तो उसे पिताजी बाद में नजर आते थे, उनके चेहरे के सामने रखी हुई बोतल पहले दिखाई देती थी. किसी को अंत समय में अपने कवि हृदय पिताजी को पीने-खाने की आजादी देनी ही पड़ती थी क्योंकि उन्हें ऐसा करना अच्छा लगता था. हमारे जैसे आज्ञाकारी पुत्र वहीं करते थे जो कि पिताओं को अच्छा लगे. और उस अच्छे लगने में उनकी इन आदतों को स्वीकारना भी था. पर धूम्रपान की इसी आदत ने उनके फेफड़ों को खोखला कर दिया था. मृत्यु के एक दिन पहले लिए गये उनके एक्सरे में पता चला कि उनका एक फेफड़ा लगभग समाप्त होने के कगार पर था. शायद इसी कारण हर दो-चार महीने में दमे और सांस की बीमारी के कारण उनकी हालत थोडी सी खराब होती तो वह स्थानीय सरकारी अस्पताल का रूख कर लेते थे. दो चार दिन में तबीयत ठीक हो जाती. यह तबीयत या तो नेब्यूलाइजेशन और दवाइयों के तीव्र असर के कारण ठीक होती थी या अस्पताल की पाबन्दियों में धूम्रपान नहीं करने के कारण, पर हो जाती थी और वह वापिस घर आ जाते थे. इस बार की विजिट उन्हें क्या हमें भी पता नहीं था कि उन्हें वापिस नहीं लौटने देगी.
       मुझे नहीं पता कि मेरे स्वभाव पर बाउजी का कितना असर है पर मेरे स्वभाव में जो यह 'सब ठीक हो जायेगावाली फितरत है वह उन्हीं की देन है. वह ऐसा ही करते थे, कहते, सोचते और जीते थे. देखा जाये जो वह एक तरीके से गालिब के इस शेर को जी रहे थे कि कर्ज की पीते थे मय और समझते थे कि हाँ, रंग लायेगी हमारी फाकामस्ती एक दिनबस मय की जगह कर्ज लेकर के कर्ज को ही पी रहे थे और फाकामस्ती के एक दिन रंग लाने के लिए शायद उन्होंने सोच लिया था कि अगर कभी जीवन में रंग लेकर आयेंगे तो यह बच्चे ही लेकर के आयेंगे. और मैं उनके इस गालिबाना जीने को सही साबित करने की कोशिश में लगा रहता था. सरकारी नौकरी लगते ही मैंने उनकी आर्थिक जिम्मेदारियों को वहन करना शुरू कर दिया था. बाद में तो उन्हें इन जिम्मेदारियों से मुक्त भी कर दिया था.
       पर जो पिछला बकाया था उन पुश्तैनी कर्जों को चुकाने में हम भाइयों की जवानियाँ खप गई थी. एक लम्बी लिस्ट थी जिनके बारहवें के कर्ज का बोझ अनायास ही उन्होंने हम जवान बेटों के कंधे पर रख दिया था या हमने खुद ही उनके सिर से वो बोझ अपने सिर पर ले लिया था. जिसमें उनके पिताजी, माँ, चाचाजी, चाची जी, चचेरे भाई, व सगे भाई के नाम शामिल थे. सामाजिक दबाव में जातीय पंच-पंचायतों में बैठ कर किये गये यह सारे काम दो रूपये सैंकड़े के ब्याज पर किये गये थे. यह कर्ज चुकते नहीं थे तो उनको चुकाने के लिए और कर्ज लेकर के अंगारों से आग बुझाने की कोशिशें की जाती थी. उस समय तक दादाजी गणपत सेठ के साथ पार्टनरशिप में ट्रक लेकर धोखा और आर्थिक नुकसान दोनों खा चुके थे. दोस्त से मिले धोखे और घाटे के गम में वह आजीविका चलाने के लिए पेट्रोलपम्प चोराहे पर पान की केबिन लगाकर उसी में ऐसा रम गये थे कि वह पुरे साल में सिर्फ एक बार दीपावली के दिन छांट भरनेके नाम से होने वाली पितृपूजा के अलावा बारहों महीने-चौबीस घंटे उसी पान की केबिन में ही रहते थे. वहीं उनका सोना-बिछाना होता था. वह केबिन और उसका एकाकीपन उन्हें इतना रास आ गया था कि उस केबिन से वह जीवित वापिस नहीं आ सके, वहीं उनकी मृत्यु हुई वहीं से उनके पार्थिव शरीर को घर लाया गया था.
       जब बुरा वक्त आता है तो सब तरफ से आता है और वो सभी तरफ से आया. कंगाली मे आटे गीले होने की तरह उसी दौर में चोरों ने घर में बचे खुचे सामान पर हाथ साफ कर डाला. बाउजी के छोटे भाई यानि छीतर काकाजी भी इसी समय अपनी पत्नी को लकर अलग हो गये. जिसके कारण एक संयुक्त परिवार में 4 बच्चों वाले बड़े भाई को जो आर्थिक मदद नवविवाहित छोटे भाई से मिल सकती थी वह भी बन्द हो गयी. इसी समय पिताजी का स्थानान्तरण हो गया और उनको पैतृक घर-गाँव से पहली बार बाहर निकलना पड़ा. घर में बाकी बचे बुजुर्गों ने भी क्रमिक रूप से हर दो-चार सालों में ऊपर जाने की पगडंडी बना ली. उनके क्रियाकर्मो में कर्जे ने घर में पहली बार प्रवेश किया और उत्तरोत्तर बढ़ता गया. और साथ ही आकार और आवश्यकताओं में बढ़ते गये दो-दो साल के अन्तराल पर जन्मे हम चार भाई जो बचपन से ही उस गरीबी से जुझते रहे. उस जूझने की हद यह थी कि एक बार तो पिताजी को लगा कि मैं नागालैण्ड से सालाना छुटिटयों पर आऊंगा तो इतना पैसा खर्च होगा तो इससे बेहतर तो यह होगा कि मैं इस साल छुटिटयों पर ही नहीं जाऊँ. और वह उस साल नहीं आये यानि दो साल बाद आये. और दो साल बाद वह आये तब मैं उनके पास जाकर खड़ा हुआ तो वह मुझे पहचान भी नहीं पाये थे. गये तब में नवीं कक्षा में पढने वाला बच्चा था दो साल बाद जब वह आये तो मेरे दाढ़ी मूछ आने लग गयी थी. 
       पिताजी मैं साहित्यिक अभिरूचि थी या लिखने पढ़़ने के प्रति अतिरिक्त लगाव था यह उनकी बातचीत से पता लगे या नहीं लगे पर उनके लेखन से लग गया था.  मुझे याद आ रहा है कि एक बार उन्होनें अपने परिवार के बारे में लिखना शुरू किया. हो सकता है कि यह उनकी मी कसा झालोसाबित होती अगर पूरी लिखी जाती. पर 20-25 पेज के बाद उन्होनें लिखना रोक दिया. उनकी हस्तलिपि में लिखे यह पृष्ठ मेरे हाथ लग गये, मैंने पढ़ा, देखा कि परिवार की वंश वृक्षावली से उन्हौंने लिखना शुरू किया था. कि यह हमारा परिवार है, यह गौत्र है, यह पुरखे हैं, यह रिश्तेदार है. इतने भाई-बहन है और इन्हीं जिक्र में अपने चचेरे भाई(नाथ्या काका) तक आकर उनकी कलम रूक गयी थी. बाद मैं किसी दिन मैंने पूछ लिया था कि-'आपने जो आत्मकथ्य जैसा कुछ लिखना शुरू किया तो उसको बीच में ही क्यों रोक दिया ?' उनका दिया गया कारण यह था कि वह 'नाथ्या काका' के बारे में लाख प्रयत्न करने के बाद भी उसके आगे कुछ लिख ही नहीं पा रहे थे. उसकी शादी हो गयी थी, पत्नी ने आना-जाना शुरू कर दिया था. बाद में काका ने पत्नी को लाने से मना कर दिया. मामला तलाक तक चला गया. बाउजी के निर्धारित परम्परावादी सोच और लेखन में शादी के बाद किसी का यूं रिश्ते को तोड़ना और विवाह विच्छेद कर लेना काबू में नहीं आ रहा था इस लिए बाउजी की कलम वहीं रूक गयी. वह समझ ही नहीं पा रहे थे कि इस सारे प्रकरण को किस तरीके से अंकित करें. मुझे आज भी इस बात का दुख है कि  बाउजी के लिखे वह 20-25 पेज, जीवन की आपाधापी में कहीं खो गये. इसका अफसोस मुझे जीवन भर रहेगा. पर उनका यह साहित्यिक रूझान और शिक्षा से लगाव हम चारों भाइयों में परिलक्षित होता था. सी.आर.पी.एफ. में नर्सिंग सहायक के पद से सेवानिवृत्त सबसे बड़े भाई बाबूलाल जी की हिन्दी और अंग्रेजी की हेंड राइटिंग किसी अच्छे से अच्छे केलिग्राफरों को शर्मिन्दा कर सकती थी. मैंने स्वयं अब तक की जिन्दगी मे उनसे सुन्दर लेखन किसी का नहीं देखा है. जो उनसे छोटे हैं और पुश्तैनी खेती और स्थानीय पार्षदायी स्तर की राजनीति करने में व्यस्त रहते हैं वह मंच पर कविता पढ़ते समय कुछ और ही होते हैं. तीसरे नम्बर पर आने वाला मैं यह सब लिखने की गुस्ताखी कर रहा हूँ. मुझसे छोटा जो राजस्थान पुलिस में कांस्टेबल के पद पर था वह लोरी कॉलिन्स और डोमिनिक लापियर की किताब फ्रीडम एट मिडनाइट  के हिन्दी अनुवाद बारह बजे रात केको आद्योपान्त पचाने की क्षमता रखता था. वह उसकी सबसे प्रिय पुस्तक थी.
       मारना-पीटना तो दूर की बात है मैंने कभी बाउजी को ऐसा कोई अवसर नहीं दिया कि वह मुझ से नाराज होकर मुझे डाट सकें. बाकी तीनों भाइयों और जीजी से ठेठ ढूंढ़ाड़ी में बात करने वाले बाउजी मुझ से हमेशा शुद्ध हिन्दी में बात करते थे. हमेशा आप करके बात करते थे. शादी के बाद जब परिवार में सबसे ज्यादा पढ़ी लिखी महिला के रूप में 'शरीके हयात' ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई तो उनको यह देखकर और सुनकर काफी अजीब लगा. वह बोली कि-बाउजी आप से एैसे-कैसे बात करते है. शुद्ध हिन्दी में और वह भी आप-आप करके.उसे लगा कि एक ग्रामीण क्षेत्र में शहरी परिवेश से आई पढ़ी-लिखी बहु के सामने इम्प्रेशन जमाने के लिए यह बाउजी के द्वारा सप्रयास किया जा रहा है. पर जब देखा कि ऐसा बाउजी हमेशा करते हैं तो उसे इस पिता-पुत्र के रिश्ते को समझने में समय लगा. मैंने पत्नी की जानकारी में यह और इजाफा किया कि ऐसा मेरी नौकरी लगने के बाद से नहीं हुआ है. बल्कि स्कूल के जमाने से ही हो रहा है. मैं चार भाइयों में थोड़ा अलग सा था. मैं तब भी चीजों को दिल पर ले लेता था. अभी भी ले लेता हूँ. पढ़ने में भी तीनों भाइयों से तेज था. मुझे आज भी दुख है कि मेरी वजह से उन तीनों को डाट पिटती थी. शायद यही वजह थी कि मुझे बचपन में एक समय तक दो बड़े भाई तो बड़े भाई छोटा भाई तक ठोक-पीट देता था कि -'तू पढ़ता ही क्यों है, तेरी वजह से हमको चार बातें सुननी पड़ती है.'
       2007 में एक हादसे में बड़े भाईसाहब बाबूलाल जी चले गये. मैं बुदबुदाया था कि कजा है, कहर है, जख्म है किस्मत की चालाकी है, चार दरवेश थे एक तो गया, अब तीन बाकी है.' पर मुझे भी पता नहीं था एक और दरवेश जल्दी ही निकल लेगा. पांच साल बाद 2012 में ऐसे ही किसी हादसे में छोटा भाई भी चला गया. इनके जाने का दुख बाउजी को आधा कर गया. उनके चेहरे और बातों से असमय हुई इन मौतों का अहसास हमेशा छलक आता था. आज बच्चे को बुखार आ जाती है तो हम हिल जाते हैं, खाना पीना भूल जाते हैं ...कभी कभी सोचता हूँ कि बाउजी ने इतनें बड़े दुःखों को कैसे सहन किया होगा ? कैसे अपनी आँखों के सामने अपने बच्चों को दम तोड़ते हुए देखा होगा ? ये पहाड़ से दुःख और उसे सहन करते बाउजी ! जब भी इस बारे में सोचता हूँ तो हिल जाता हूँ. वह वहां गाँव में सबके सामने चुप रहते थे पर मैं जब भी घर जाता था तो दुखों के कारण बह जाते थे. पता नहीं क्यों पर उनकी निगाह में एक बेटी ही पिता को सही तरीके से समझ सकती थी. हम चार भाइयों को कोई बहन तो थी नहीं इसलिए वह मुझे ही बेटी मानकर सारा दुःख कह देते थे. वह अपना सारा दुःख मेरे से बयां करते थे. मैं उनको हिम्मत बंधाने का काम करता था और खुद मेरी ही हिम्मत जवाब दे जाती थी. कभी गुस्से में आकर वह बाकी परिवार वालों के बारे में अगर कुछ कह भी जाते थे तो मैं उन्हें शान्त रहने की सलाह देता था. वह भाषा को लेकर इतने सतर्क रहा करते थे कि यदि कभी गुस्से में भी हुए तो कहना न मानने वाली बहुओं के लिए मकड़ीऔर आवारा और शैतान बेटों व पोतों के लिए मकड़ाही उनके मुंह से निकलने वाली सबसे बड़ी गाली होती थी. मुझसे खुश होकर बाउजी अक्सर आसमान की तरफ हाथ उठाकर अपने साथ के लोगों से कहा करते थे कि मेरे तो सारे काम भगवान ही करता है ..उनके कहे में छुपे मंतव्य को और कोई समझे या नहीं पर मैं समझ लेता था. अब मैं सोचता हूँ कि क्या यह सब काम भी मेरे ही हाथों पूर्ण होने लिखे थे. मैं कभी नियति को शुक्रिया कहता हूँ कि मुझे यह अवसर दिया तो कभी अवसाद में भी उतरने लगता हूँ कि क्यों ईश्वर ने यह सब करने के लिए मुझे ही तैयार किया है.
       बून्दी से भीलवाड़ा स्थानान्तरण होकर आने के बाद वह दो चार दिन हमारे साथ आ जाते थे. दो चार दिन रहते थे तो मन उचट जाता था. मैं हमेशा रहने की जिद करता तो उन दिनों उनका बहाना यह बनने लग गया था कि-आप किराये के मकान में रहते हो भला किराये के दो कमरों में, मैं कैसे रह सकता हूँ.’ 2014 में जब मेरा स्वंय का मकान भी हो गया तो उन्होंने कहा कि मैं अब आप ही के साथ रहूँगा और मैंने उनकी कही इसी एक बात को पकड़कर उत्साह और जोश में जितना जल्दी हो सका था उतनी जल्दी उस मकान में रहने की तैयारी कर ली थी. किराये के मकान से अपने मकान में शिफ्ट भी हो गया. उनको लेने जब गांव गया तो वह कर चले हम फिदा जानो तन साथियों, अब तुम्हारे हवाले वतन साथियोंवाले भाव के साथ बाकी सब लोगों और परिवार वालों से इस तरीके से रूखसती लेकर के आये थे जैसे कि शायद अब वह कभी लौटकर के वापिस नहीं जायेंगे. मैं बेहद खुश था कि अब जीजी-बाउजी हमारे साथ रहेंगें और पहली बार बच्चे सीखेंगें की सम्पूर्ण परिवारक्या होता है. पर 10-12 दिन में ही उनका मन उचट गया. गांव उनको बेहद याद आने लगा. मौहल्ले की याद सताने लगी. वहाँ हर आता जाता आदमी राम-राम के जवाब में राम-राम करना पसन्द करता था जो कि शहर में उनको नहीं मिलता था. इसीलिए बाउजी को गाँव हमेशा अच्छा लगता था. 10-15 दिनों बाद मेरा ममेरा भाई 'भंवर' गांव से मिलने आया था. दूसरे दिन वह जाने लगा तो वह सुबह उससे पहले नहा धोकर 'राजा बेटा' की तरह बाहर दरवाजे के पास जाकर बैठ गये. कहा कि-'अब इतने दिन हो गये मैं भी इसी के साथ जाऊंगा. और वैसे भी मैं आता-जाता रहूँगा.' वह उस दिन मेरे मना करने के बाद भी चले गये. बाद में वह आते रहे, जाते रहे. दो चार दिन रूकते, फिर चले जाते. अपने गांव में जिस बलाइयों की रामदेव जी महाराज की सराय को छोड़कर उन्होनें गुर्जर मोहल्ले में रहना चुना था वह उनको पुकारने लगता. गांव से पडोसियों के फोन आने लग जाते कि बाउजी कब आ रहे हो. वह वहाँ जाते और मौहल्ले भर के बाउजी बनकर के बैठ जाते.
       उस मौहल्ले का नाम 'गुर्जर मौहल्ला' था और हमारा घर उस मौहल्ले का प्रवेश द्वार कहा जा सकता था. उस मौहल्ले में आने-जाने वाले हर व्यक्ति को हमारे घर के सामने से गुजरना होता था. अपने सुसराल से मायके आने वाली बहन-बेटियों को वह कभी खाली हाथ नहीं जाने देते, 10-20 रूपये जो भी उनके पास होते वह वहाँ से विदा होने वाली हर बहन-बेटी के हाथ में जरूर रख देते. उस गली से स्कुल जाने वाले बच्चों को वह बहुत प्यार करते. सुबह बाहर कुर्सी लगाकर बैठ जाते और पांव छुकर स्कुल जाने वाले हर बच्चे-बच्ची के लिए उनकी जेब में से टॉफ़ी निकल आती. सुबह के समय आस-पास के मकानों से चाय के कप उनके पास थोडे़-थोड़े अन्तराल में आते रहते. जो आस-पास के ट्रक ड्राइवर काम से लौटते वह पहले बाउजी के पास बैठते फिर अपने घर जाते. काम पर लौटते समय वह बड़े बुजुर्ग के नाते अपने बच्चों की जिम्मेदारी बाउजी को सौंप जाते. सुबह-सुबह जो हरिजन साफ सफाई करने आता वह हर रोज सुबह चाय बनाकर उसे आवाज देते रहते थे कि विजय बाबू ! चाय पी लीजिये'. ऐसा कभी नहीं होता था कि बाउजी सुबह की चाय भी अकेले पीते हो. मेरे दोस्त आते तो वह भी उनसे दोस्तों की तरह घुल मिल जाते. वह गुर्जर मोहल्ला उनमें इस तरीके से रच बस गया था. जाति समाज का ऐसा कोई व्यक्ति नहीं होगा जो घर पर आया होगा और बाउजी ने उसे खाना खिलाकर के नहीं भेजा होगा. उनका मानना था कि घर से कोई भूखा नहीं जाना चाहिए इसलिए बाद के दिनों में तो घर में एक तरीके से लंगर सा ही चलता रहता था. बाउजी की सबसे आत्मीयता का यह यह असर कि मेहतरानी, अगर मौहल्ले में सफाई करने आती तो बदले में हर घर से मिलने वाली रोटियों को हमारे घर की ताक पर ही रखती थी. ढोलण, ढोल बजाने के बाद मिलने वाले आखे(अनाज) संभालने के लिए हमारे ही घर रूकती थी. जागा, सबके क्रिया कर्मों की प्रविष्टियाँ दर्ज करने के बाद सोने और रुकने के लिए हमारे ही घर की पोल को खोजता था. और इन सब की एकमात्र वजह बाउजी का व्यवहार और उनका सरल स्वभाव था.
       इनके अलावा गाँव में रहने की बाउजी की एक और वजह भी थी. और वह जायज वजह थी. वह उस जमाने के पिता थे जो उस बच्चे के पास ठहरना पसन्द करते थे जो आर्थिक रूप से सबसे कमजोर हो. और उनकी निगाह में यह मैं नहीं था इसलिए वह मेरे साथ नहीं बल्कि गांव में ही रहना पसन्द करते थे. मेरी तरफ से एक तरीके से वह निश्चिन्त थे कि यह अपने सारे काम खुद कर लेगा, इसे अब मेरी जरूरत नहीं है. दो भाई सरकारी सेवा में थे जिनके हादसों में गुजरने के बाद भी उनकी पेन्शन से उनके परिवार चल रहे थे पर जो भाई उनके पास था वह उसे पूरा सहयोग देते. उनका, उसके पास रहना, उसकी मदद करना था. वह जानते थे कि पारिवारिक समाजवाद कैसे चलाना है और वह उसे बखूबी चला रहे थे. उनके भागीरथी प्रयासों में सहयोग देकर मुझे भी अच्छा लगता था.
       गांव में मेरे लिए सबसे अच्छे पल वहीं थे जब मैं उनको उन्हीं दुकानों पर लेकर जाता था जहाँ बचपन में वह हम चारों भाइयों को लेकर जाते थे. जहाँ उन्होंने बचपन में मुझे ले जाकर जूते पहनाये थे मैं भी अब उन्हीं दुकानों पर उन्हें ले जाता था. जहाँ उन्हौंने हमारे कपड़े सिलवाये थे, मैं भी उनके कपड़े सिलवाने के लिए उन्हीं दुकानों पर जाता था. जाहिर सी बात है कि वह सब दुकानदार उनके पुराने मित्र ही होते थे जिनसे मिलकर उनको खुशी होती थी और यह देखकर के और भी ज्यादा खुशी होती थी कि अब उनके साथ में, मैं भी होता था. यह उनके लिए उनकी जिन्दगी के बेहद गौरवशाली क्षण होते थे. 
       जैसे एक शिक्षक सेवानिवृत्त होता है तो उसके बाद शिक्षा से उसका नाता नहीं छुट जाता उसी तरह हॉस्पिटल मेस के हेड कुक के पद से रिटायर बाउजी किचन से कभी अलग नहीं हो सकते थे. बहुओं ने यदि किचन संभाल भी लिया तो भी घर में सबसे पहले उठकर सुबह की चाय बाउजी खुद ही बनाकर पीते थे. कौन पिता होगा जो ऐन सुबह 5 बजे अपने बेटे को उठाते हुए कहता हो कि गुड मार्निंग बेटे जी ! आपकी चाय तैयार है.’ उनकी सुबह की उस काली चाय के साथ ही वहां होने पर मेरे दिन की शुरूआत होती थी. शुरुआत में मैंने चाय बनाने की कोशिश की पर लगा की इससे बाउजी को अपने अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप महसूस होता है तो मैंने हाथ खींच लिए थे. हाँ इतनी गुस्ताखी मैं जरुर करता था कि कई बार रात को कॉफ़ी बनाकर बाउजी के सामने पेश करते हुए उन्हें यादों के किस्सागो में ढल जाने देता था. उनके पास अपने संघर्षों की कई कहानियां थी. हमारे पास इन बातों को समेट लेने के लिए अथाह जिज्ञासा थी. बाउजी एक दोस्त की तरह अपने गुज़रे समय को कही गयी बातों में उतार देते थे. कालेज में पढ़ाई के दौरान मेरा दोस्त इलियास तो बाउजी के सोने के बाद भी उनसे मजाक करने के स्तर पर उतर जाता था. रात को पढ़ते वक्त जब वह देर रात चाय काफी बनाता तो बाउजी को पिलाये बिना नहीं मानता था. 
       जितना उस गर्वीली गरीबी में उन्हौंने हम चार बच्चों के लिए और इस परिवार के लिए किया मैं अपनी सारी कोशिशों के बावजूद उसका शतांश भी शायद अपने बच्चों,परिवार के लिए नहीं कर पाउंगा. उन अभावों में भी उन्होंने हमें कोई कमी नहीं आने दी. राज्य के सर्वश्रेष्ठ महाविद्यालयों में से एक में पढ़ने का सौभाग्य दिया. मुझे पिताजी का वह पत्र आज भी याद है जो 1986 में देवली की हायर सैकण्डरी स्कूल टॉप करने के बाद बाउजी ने दादाजी को लिखा था. मैंने बाउजी को पत्र से सूचना दी थी कि मैं फर्स्ट क्लास पास हो गया हूँ  मैंने स्कूल टॉप किया है. पता नहीं था कि आगे क्या करूंगा और उस समय घर के मुखिया दाजी(दादाजी) मुझे पढ़ने के लिए किसी अच्छे संस्थान में भेजेगें या नहीं. मैंने पत्र में उनसे इस बारे में जिक्र किया था. प्रत्युत्तर में पिताजी का 12 जून 1986 को दीमापुर नागालैण्ड से दाजी के नाम लिखा हुआ बहुप्रतिक्षित पत्र प्राप्त हुआ जिसमें उनके दिल की बात कुछ इस तरीके से बयाँ थी.
       दाजीको मालुम हो कि भगवान का पत्र मेरे पास आया था वह पढ़ाई के अन्दर अच्छे नम्बरों से पास हो गये हैं जी. आप उनको जैसी भी पढ़ाई वह पढ़ना चाहे वैसा ही आप इन्तजाम कर देना जी. हमें मालुम है कि आपके पास पैसा नहीं है, मगर दाजी आज का खर्च ही कल की आमद है और फिर यह तो बच्चो की जिन्दगी का सवाल है. पैसा अगर हमारे सिर हो जायगा तो बाद में चुकाते रहेंगे जी मगर पहले हम को इनका जिन्दगी बनाना है. दाजी भगवान शंकर जी की कृपा से बेटे तो नहीं मगर आपको पोते बडे होनहार दिये हैं, भगवान शंकर जी इन को खुश रखें. यही आपका नाम रोशन करेगा. भगवान पर हमें पुरा भरोसा है. दाजी आप किसी बात की चिन्ता मत करना जी, अब बगैर कर्ज लिये हुये तो हमसे यह बच्चे पढ़ेंगें नहीं. हमको मालुम है की अभी खर्चा ज्यादा और आमद कम है तो कर्ज तो होगा ही मगर भगवान शंकर जी की कृपा से सब ठीक ही होगा जी. दाजी जब आप ने इन बच्चों को ग्यारह साल तक तो पढ़ा दिया है और अब तो चार या छह साल कि बात और है फिर देखना दाजी कि आपका भगवान आपको क्या करके दिखाता है. दाजी बस एक रूपये में से दस आना तो आनन्द हो गया है अब तो भगवान शंकर जी की कृपा से बस छः आने की बात है. दाजी यह बच्चे होनहार है इसलिये में आप से बार-बार यही प्रार्थना करता हूँ कि आप इनका दिल मत तोडना इनकी जिन्दगी व आपकी इज्जत का सवाल है
       क्या वह जान गये थे कि 4-6 वर्ष के भीतर ही मेरे पास नौकरी होगी. क्या उनकी दुआ इसके लिए काम कर रही थी. क्या वह जानते थे कि इससे ज्यादा के अभाव एक परिवार के तौर पर हम बर्दाश्त भी नहीं कर पायेंगे. क्या वह जानते थे कि यह गरीबी हमेशा नहीं रहेगी, और एक ना एक दिन सब कुछ ठीक हो जायेगा. क्या इसी कारण से वह बच्चों की इच्छाओं के सामने अपने हर एक सपने को न्यौछावर कर देते थे. न कभी उन्होंने अच्छा खाया ना कभी अच्छा पहना. बाद में न कभी कपड़ों की कमी थी और ना किसी बात की फिर भी वह अपने हाल में ही मस्त रहते. कभी मैं जिद भी करता कि आपके कपड़े गन्दे हैं, पुराने हैं तो वह इस पर ध्यान नहीं देते थे और हंस कर इस बात तो टाल जाते थे. खुद को गरीब कहलाना और गरीब रखना उन्हें अच्छा लगता था. उस मौहल्ले में यह उनको जमीन से जोड़ने का कार्य करती थी.
       मैंने कभी भी बाउजी के हाथ में पैसे कमाकर नहीं दिये और में ईश्वर से दुआ करता था कि कभी ऐसा वक्त भी नहीं आये कि मुझे बाउजी को पैसे देने पड़ें. वहाँ तो एकतरफा रास्ता था और वह उनके मृत्युपर्यन्त बना रहा. मैं इतना बड़ा कभी होना ही नहीं चाहता था की बाउजी को कुछ दे सकूँ.राजकीय सेवा के शुरूआती दिनों में, मुझे जो कुछ भी मिलता वह माँ के हाथों में लाकर रख देता था. इसी कारण कभी-कभी बाउजी मजाक करते हुए, जीजी को छेड़ते भी रहते थे कि-'बेटा तेरे को ज्यादा प्यार करता है मुझे नहीं. पैसे भी तो वह कमाकर तेरे को ही देता है.' एम.एससी. के दौरान मैंने अजमेर के बोन-बोन शूज से नाइक के जो जूते खरीद कर के पहने थे वैसे ही जूते मेरे सहपाठी शेखर ने भी पहने थे जिसके इंजिनियर पिताजी और बाउजी की आय में आठ-दस गुना अन्तर था. मेरी हर इच्छा को पूरा करके बाउजी को सूकून मिलता था. उन्हें लगता था कि जो वह नहीं कर पाये वह कम से कम कर बच्चे तो कर लें. और हमने किया भी और उन्हीं की उस अल्प तनख्वाह के दम पर किया. बाद में जब नौकरी में आने के बाद में एक दिन अपने पुराने जूते रिपेयर कराने जा रहा था तो उन्हौंने टोक दिया कि-आप नये जूते क्यों नहीं ले लेते’. मैंने जवाब दिया था कि-अब नहीं ले सकता क्योंकि मैं कमाने लग गया हूँ, वह सारी फिजूलखर्ची की शरारतें और आवश्यक बेवकूफियाँ तो आपके पैसे से पूरी की सकती थी. अब समझ मैं आ गया है कि पैसा कितनी मुश्किल से कमाया जाता है और उसे कितने किफायत से खर्च करना चाहिए.'
       जब भी में गांव अपनी कार लेकर जाता था तो वह पांव छूने की सामान्य औपचारिकताओं के बाद मुझे जीजी के साथ कमरे में अकेला छोड़ देते थे.मैं जीजी से गलबहियाँ करता, वह पुच्चियों का प्यार बरसाती तब तक बाउजी मकान की सीढियाँ उतर कर गाड़ी के पास जाते थे. उसको प्रणाम करते थे, उसके आगे पीछे घुमकर उसे बारीकी से देखते थे. यदि कहीं कोई स्क्रेच होता था तो वह बाद में पूछते थे कि वहाँ नया निशान लगा हुआ है, क्या बात हो गयी थी. मैं उनको स्पष्टीकरण देने में लगा रहता था. अब हालत यह हें कि कल जबसे घर के बाहर नयी कार लाकर खड़ी की है तब से ही उनका नहीं होना अखर रहा है. मेरी हर एक चीज़ से लगाव रखना उन्हें अच्छा लगता था. अब कोई नहीं हैं जो इस तरीके की आत्मीयता दिखाये. यहाँ भीलवाड़ा मकान पर आने के समय भी उनका यही भाव रहता था. मकान को प्रणाम करने के बाद ही वह घर में प्रवेश करते थे.
       आज 1 मार्च को पूरा एक साल गुजर जाने के बाद भी वह मंजर याद आ जाता है तो क्षण भर को दिमाग सुन्न हो जाता है.....आपके बिना, बीते एक साल में ऐसा एक भी दिन नहीं गुजरा होगा जिस दिन मैने आपको याद नहीं किया होगा. ऐसा एक भी दिन नहीं बीता होगा जिस दिन मैंने आपके बारे में सोचा नहीं होगा....... आपके दुख ना तो पूरी तरह से मैं कम कर सकता था ना ही मैं कम कर पाया होऊंगा. मैंने अपने पूरे मन से कोशिश जरूर की होगी पर मेरी कोशिशें कितनी कामयाब हुई कितनी नाकाम यह शायद आप भी जानते-समझते थे और मैं भी. मैं जानता था कि आपने जिन्दगी मे जो कुछ कमाया था वह मैं था. इसीलिए मैं कोशिश करता था कि मेरी किसी बात से आपको कोई तकलीफ नहीं हो.
       सच बात तो यह है कि मैंने जिन्दगी में सिर्फ आपकी तरह होना चाहा है. मुझे आप जैसा विशाल हृदय मिले जो सबको साथ लेकर चलने की सहनशीलता रखता हो. आप जैसी हिम्मत दे, समझ दे. आपकी जितनी आयु तो पता नहीं संजीव कुमार सिन्ड्रोमसे ग्रस्त मुझ जैसे 'सेंटीमेंटल इडियट' को मिलेगी या नहीं. यदि मिली भी तो क्या नियति मुझे भी ऐसे ही किसी अस्पताल के बेड पर लाकर लिटा देगी जहाँ मैं भी अपने लख्ते-ज़िगर को अपने अन्तिम समय में ऐसे ही देखते हुए अपने प्राण तज दूंगा. 
       सवाल उठना लाजमी है कि यह सब लिखने का क्या फायदा. कोई इसे क्यों पढ़े और उससे भी पहले सबसे  बड़ा सवाल ये कि कोई ये सब लिखे ही क्यों ? क्यों अपने मन के भाव और भावनायें सार्वजनिक की जाये ? पर मैं जान गया हूँ कि कल आप थे पर अब नहीं हैं. मैं आज हूँ पर जानता हूँ कि एक दिन मैं भी नहीं रहूंगा. मैं जानता हूँ कि इस दुनिया में कुछ भी स्थिर नहीं है सिवाय सनातन अस्थिरता के. इस दुनिया में अगर कुछ स्थिर हें तो यह शायद शब्द ही हैं. इन्हीं शब्दों को लिखते हुए में आपको याद कर रहा हूँ. हो सकता है कि एक दिन मेरी संतानें भी इन्ही शब्दों को देखें. अगर यह सनातन संस्कृति मानती हैं कि शब्द ही ब्रह्म है तो हो सकता है कि आप जहाँ कहीं भी हो वहाँ तक यह शब्द ही पहुंच जायें और आपको बता सके कि आपका अंश आपके जाने के एक साल बाद भी वहीं स्थिर हो गया है जहाँ अन्तिम बार आपने उसे गौर से देखा होगा.
       .........भाई कह रहा था कि उस दिन आखिरी सांस लेने से पहले आप सिर्फ और सिर्फ मुझे देख रहे थे. सारी उम्र मैं अपनी तरफ देखती हुई, आपकी, उन आशान्वित आँखों में, देखने की हिम्मत कभी नहीं जुटा पाया तो उस समय कैसे देख पाता. मैं तो एक साल गुजर जाने के बाद भी उन गमगीन लम्हों की स्मृतियों में, अपने आप को, आपकी तरफ असहाय होकर देखते हुए, आज भी नहीं देख पाता हूँ .....

बुधवार, 31 जनवरी 2018


यह जनवरी ऐसे ही नहीं जाने दूंगा



.....उन दिनों नेट पर कहीं पढ़ लिया था कि 'ब्लॉग' पर यह होता है ....'ब्लॉग' पर वह होता है....'ब्लॉग' पर आप यह कर सकते हैं....'ब्लॉग' पर आप वह कर सकते हैं ....मैंने उसी धुन में, जूनून में, या ज़िद में और कुछ किया या नहीं किया पर अपने लिए एक अदद 'ब्लॉग' ज़रूर बना लिया था. उस समय तक कृति देव 'फॉन्ट' में लिखी हुई अपरिपक्व, बचकानी तुकबन्दियों से मेरा कंप्यूटर भरा पड़ा था, बस नेट के माध्यम से ही 'फ़ॉन्ट कनवर्टर' की मदद ली गई और 'ब्लॉग' पर उसी में से बहुत कुछ फैला दिया गया. पहले-पहल यह सब अच्छा लगा पर जल्दी ही मैं इस गोरखधंधे से भी बोर हो गया. उस समय, जीवन और ज़माने में कुछ भी नहीं बदल पाने की पीड़ा और अपने इन प्रयासों की असफलता का जो अफ़सोस मुझ पर हावी था, वही रचनात्मक सन्नाटा बनकर 'ब्लॉग' पर भी पसर गया था. यह वह दौर था जब कहने को बहुत कुछ था पर कैसे कहना है, यह नहीं पता था. बस सोचता रहता था कि कैसे कहूं ? किससे कहूं ? और क्यों कहूं ? किस लिए कहूँ ? ऐसे बहुत सारे सवालों से मैं हर दिन जूझता रहता था. यह भी डर लगता था कि अगर मैं लिख भी दूँ तो इसे कौन पढ़ेगा ? और कौन पढ़ना चाहता है ? जो मेरे बचपन के लंगोटिया यार हैं उनमें से 'ब्लॉग' तो बहुत दूर की बात हैं, स्मार्टफोन या फ़ोन पर भी नहीं थे. जो दोस्त एक दिन साथ में अख़बार बांटता था, वह आज भी अख़बार ही बाँट रहा हैं. जो साथ में एक दिन मजदूरी करता था, वह आज भी मजदूरी ही कर रहा हैं. ऐसे समय में आप चुप रहकर अपने और उनके साथ गुनाह कर रहे होते हैं और कुछ गलत बोलकर पाप के भागीदार बनते हैं. इसलिए उस वक़्त चुप रहना ही मुनासिब था.
बहुत मुश्किल होता हैं उन लोगों के बारे में कुछ भी लिखना जिनके बारे में आप यह पहले से ही जानते हैं कि वह आपके इस लिखे को कभी नहीं पढ़ पाएंगे. इस वज़ह से आपकी उन दोस्तों के प्रति रचनात्मक ईमानदारी और जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती हैं. यह भी हमारी रचनात्मक प्रतिबद्धता ही मानी जा सकती हैं की हम उनसे अलग कुछ लिख भी नहीं सकते थे. उस समय तक इतना तो समझ में आ ही गया था कि जिनको आप अच्छे तरीके से जानते हो, उनके बारे में लिख कर ही, लिखने के साथ इन्साफ किया जा सकता है. वैसे भी तेजी से दौड़ते इस कालखण्ड में किसके पास समय है इस तरह की बातें पढ़ने/सुनने के लिए. इसलिए उस दौर में चुप रहना ही लाज़िम था. पर कुछ था जो उबल रहा था, जो बाहर आना चाहता था, जो आप को बेचैन कर रहा होता है .....पर कभी-कभी ऐसा भी होता हैं की भरपूर कोशिशों के बाद भी आप समझ ही नहीं पाते कि बात क्या कही जानी चाहिए और कहाँ से कही जानी चाहिए.घूम फिर कर बात "शुजा बाबर" के उसी शेर पर आकर अटक जाती थी कि
"कहां से इब्तिदा कीजे, बड़ी मुश्किल है दरवेशों,
कहानी उम्र भर की है,यह मजमा रात भर का है !
मैं भी यही सोचता रहता था कि उम्र भर की इस 'लम्बी कहानी' को इस 'रात भर' के 'ब्लॉग' में कैसे समेटा जा सकता है. एक ऐसे वक्त में कुछ भी बोलना, वैसे भी बहुत ज्यादा जोखिम का काम माना जायेगा जहां पर बात-बात में खामोशी को हिदायत की तरह इस्तेमाल किया जाता हो. जहाँ आपके लिखे हुए शब्दों के बीच में बची खाली जगह के भी मनचाहे मायने निकाले जा सकते हों. इस दौर मैं जब कि आप लाख कोशिशें करने के बाद भी यह पता नहीं लगा सकते कि लोग खौखले हैं, इसलिए दौगले हैं या दौगले हैं इस वज़ह से खौखले हैं. एक ऐसे वक़्त में जब बोलने और लिखने की वज़ह से किसी का होना हमेशा के लिए मिटाया जा सकता हो वहां पर कोई भी बोलने का जोखिम ले ही क्यों ? पर मैं जान गया था कि इतना सब कुछ होने के बाद भी यदि और कुछ बचे या नहीं बचे तो भी सिर्फ और सिर्फ बचे रहेंगे शब्द. हम रहें या नहीं रहें पर शब्द हमेशा रहेंगे. शब्द किसलिए बचे रहेंगे ? क्योंकि इस बीत रहे समय के साक्षी सिर्फ और सिर्फ शब्द ही हैं. इसलिए मैंने सोच लिया था और खुद से वादा किया था कि चाहे कुछ भी हो जाये पर इस महीने इस 'ब्लॉग' पर कुछ न कुछ जाना ही जाना है. मैंने 'ब्लॉग' देखा तो पाया कि इस पर अंतिम पोस्ट राजकीय महाविद्यालय में एम.एससी. के दिनों को याद करते हुए 3 जनवरी 2012 को लिखी गई थी. उस बात को छः साल बीत चुके हैं. यह जनवरी 2018 है और मैंने ठान लिया है कि मैं इस साल की इस जनवरी को ऐसे ही नहीं जाने दूंगा. उसी कोशिश के कारण मैं आप से मुख़ातिब हूँ.
अक्सर इन बीते 5-6 सालों में होता यूं था कि हर बार एक जनवरी को नया साल प्रारम्भ होने पर या सरकारी कागजों में जन्मतिथि के नाम पर अंकित किसी तारीख के फेसबुकिया नोटिफिकेशन पर हम "फ़ैज़ अहमद फ़ैज़" की एक बहुत मशहूर नज़्म को च्युइन्गम की तरह चबाकर फेसबुक की वाल के किसी कोने पर यह लिखकर उगल दिया करते थे कि "चंद ही रोज़ मेरी जान फ़क़त चंद ही रोज़". थोड़ा सा हेर-फेर कर इस नज़्म के 'चन्द ही रोज' को महीनों-सालों की भूलभुलैया में उलझा दिया जाता था. यह सोचकर कि एक न एक दिन तो हम सभी को यह चुप्पी तोड़नी ही होगी. मगर इतना करने के बाद भी हम तय नहीं कर पाते थे कि ख़ामोश रहने के यह चंद रोज़ कितने हैं ? अनचाहे ही यह चन्द रोजों का सफ़र अनगिनत महीनों, सालों तक खिंचता चला गया था. जिंदगी और जमाने में जो कुछ भी गुजर रहा था और घट रहा था वह क्या था, क्यों था यह तो पता नहीं था पर इतना पता था कि जैसा हम चाहते और सोचते थे, वैसा नहीं था. शायद इसी कारण एक उदासी थी जो इस हालात से उबर नहीं पाने की पीड़ा के कारण अंदर तक उतर जाती थी. एक अवसाद था जो अन्दर तक घर कर लेता था. शायद ऐसे ही किसी नाजुक समय में, यह फैसला ले लिया था कि अगर कुछ कहने को नहीं होगा तो चुप रहना ही बेहतर होगा. और इसी कारण से यह अनचाही चुप्पी इस 'ब्लॉग' पर भी पसर गई थी.
       इस सन्नाटे को ध्वस्त करने का काम कई घटनाओं और व्यक्तियों ने किया था. भाई 'त्रिपाठी' गाहे-बगाहे न सिर्फ टोकता रहता है बल्कि सार्वजनिक रूप से ऐसे निजी बयान भी देता रहता है कि-"मैं एक 'ब्लॉग' की भ्रूण हत्या के दोषी को जानता हूं ...और मैं यह भी जानता हूं कि इस 'ब्लॉग' का हत्यारा कौन है" और इतना सुनने के बाद भी इधर जो बंदा मौन है वह जानता है, पूरी तरह से समझ रहा है कि उसे ना जाने किस-किस तरीके से उकसाया जा रहा है. कि ....हे पार्थ ! उठा गांडीव !! खींच प्रत्यंचा !!! कर प्रहार ....मत हार ...पर न वो अच्युत है न मैं अनघ ...इसलिए उनके सारे प्रयत्न विफल रहते थे. इधर कोई था जो उठने से पहले ही गिर जाता है. जो बनने से पहले ही बिगड़ जाता है. जो जन्म लेने से पहले ही मर जाता है. या कि जो अभी तक अजन्मा है.
       भाई 'सतीश जी' भी अक्सर यही शिकायत करते हैं कि "हर कोई कहीं न कहीं व्यस्त हैं. कोई किसी चिड़िया को लेकर फेसबुक पर उड़ रहा हैं तो कोई प्लैंकटोन पर पी.एचडी. उतार रहा है. कोई अपना शोध पत्र पढ़ने चार देशों मैं जा चुका है और अब पांचवे देश में जाने की तैयारी पर हैं. पर तुम हो कहां ? कुछ करते क्यों नहीं ? कुछ दिखते/लिखते क्यों नहीं ?" और मैं हूँ की इस सारे तमाशे में मिसफिट हूँ. मेरी हालत गालिबन वही हो जाती हैं कि "इमां मुझे रोके है तो खींचे है मुझे कुफ्र" और जो इमां(प्राणी शास्त्र) वाले साथी है वह कह देते हैं कि "रहने दो यार ! तुमसे न हो पायेगा" और कुफ्र(साहित्य) वाले तो मुझे समझते ही 'घुसपैठिया' हैं. मैं हूं कि नहीं हूं, मैं नहीं हूं कि मैं हूं. मैं इसी उधेड़बुन में खो कर रह गया हूं. इमां(प्राणी शास्त्र) है जो मेरी आजीविका है. और कुफ्र(साहित्य) मेरी ज़रूरत है. इन सबके बीच मैं हूं कि रचनात्मक प्रसव पीड़ा से मुक्त ही नहीं हो पाता. भविष्य में कुछ लिखने के लिए न जाने कौन-कौनसे माध्यमों से इतना 'इनपुट' ले लिया गया हैं कि उसके बोझ के कारण 'आउटपुट' निकल ही नहीं पा रहा हैं. सामान्यतया 9 महीनों में किसी  स्वस्थ महिला का भी प्रसव हो ही जाता हैं पर मेरे केस में 9-18-27 तो क्या पूरा नो का पहाडा कितनी ही बार दोहराया जा चुका था पर रचनात्मक प्रसव पीड़ा से हर दिन पीड़ित होने के बाद भी कुछ भी ब्लॉग पर जन्म नहीं ले पा रहा था. पर ऐसा हो क्यों रहा था ?
आपके आस-पास जो कुछ भी घटित होता हैं आप उससे प्रभावित होते हैं, जो आपकी संवेदना को छूता हैं और आप उसके बारे में कुछ भी कहना चाहते हैं, बोलना चाहते हैं, बताना चाहते हैं. जब आप अपने प्रिय लेखक 'राही मासूम रज़ा' के गुज़र जाने के बाद आप किसी मासिक साहित्यिक पत्रिका में उन्हीं का यह वक्तव्य पढ़ लेते हैं कि "मुझे दुःख हैं कि मेरे लेखन से कुछ भी नहीं बदला" तो फिर लिखने के औचित्य पर ही सवाल उठाने लगते हैं. आपको कुछ भी लिखना बेमानी लगने लगता है. कुछ बुनियादी सवाल सर उठाने लगते हैं कि "क्या लिखने से कुछ बदलता है ? क्या आपका लिखा किसी के लिए पढ़ने लायक हैं ? क्या आपका लिखा किसी के पढ़ने के बाद उसकी ज़िन्दगी पर कोई प्रभाव डालता हैं ?" या कहीं ऐसा तो नहीं कि बेसिकली आप "सेंटीमेंटल इडियट टाइप" के इंसान होते हैं और आप यह सारा साहित्य-वाहित्य पढ़कर इस पढ़े गए साहित्य में किसी अपने ही जैसे "सेंटीमेंटल इडियट टाइप" इंसान को खोज रहे होते हैं. आप की सारी साहित्यिक अभिरुचि पढ़ने-पढ़ाने के बहाने इस पढ़े गए साहित्य में आपके जैसे ही किसी दूसरे को खोजने की अंतहीन मुहिम का हिस्सा बन जाती है. अपने जैसा कोई किरदार तलाशने की भूख ही आपको साहित्य में ले जा रही होती है और अनायास ही आप वहीं चले जाते हो और अपने जैसे किसी दूसरे को पढ़े जा रहे साहित्य में खोज रहे होते हो. पर इस का जवाब भी किसी अन्य मासिक साहित्यिक पत्रिका में 'असीमा भट्ट' ने दिया था. कि कोई तो होगा जो आपके लिखे को अपना कह सकेगा, महसूस कर सकेगा और उससे वैसे ही हिम्मत प्राप्त करेगा जैसे आपने किसी न किसी का लिखा हुआ पढ़कर प्राप्त की है. आख़िरकार आप कुछ लिखे हुए शब्दों की इसी ताकत के कारण इस दुनिया को बेहतर तरीके से जान पाते हो. आप "धूमिल" से लड़ना सीखते हैं, "दुष्यंत" से आंदोलित होना. आप "पाश" से खुद को बेहतर तरीके से समझते हैं और "अदम गौंडवी" से इस दुनिया को. आप 'राग दरबारी' पढ़कर जी खोलकर हंस भी सकते हैं और 'आधा गाँव' पढ़ कर छुप-छुपकर रो भी सकते हैं. आप बहुत सी बार तो लोगों को भी उनके बारे में लिखे हुए के कारण ही ज्यादा अच्छे तरीके से समझ सकते हैं. जैसे कि आप "आलोक धन्वा" को बेहतर जानते हो यदि आप "असीमा भट्ट" को पढ़ लेते हो. आप "नामदेव ढसाल" को बेहतर समझ सकते हो यदि आप "मल्लिका अमर शेख" को पढ़ लेते हो. आप 'मणिकर्णिका' और 'मुर्दहिया' पढ़कर ज़िन्दगी से भर उठते हैं और 'जूठन' पढ़कर गुस्से से उबलने लगते हो. ये किताबों में लिखे शब्दों की ही ताकत होती हैं जो कुछ भी पढने के बाद आपको शांत नहीं रहने देती. यह अटल सत्य हैं कि किसी भी किताब को पढने के बाद आप वह तो कदापि रह ही नहीं पाते जो कि उस किताब को पढने से पहले होते हो.
इसलिए इतना तो बहुत पहले ही तय हो गया था कि अपने आस-पास जो कुछ भी घटित हो रहा हैं उसे गौर से देखना हैं और इस तरह से देखना हैं कि यदि एक दिन इसके बारे मैं कुछ लिखना पड़ जाये तो कलम कमज़ोर नहीं पड़े और हाथ नहीं कांपे. इसलिए ज़माने और ज़िन्दगी में जब भी मौका मिलता था हम हर खेल को या तो करीब से या उस खेल के भीतर घुस करके ही देखते थे.स्कूल के दिनों से हम गाँव के खेलों में प्रवीण थे, पारंगत थे. गिल्ली-डंडा, मारदड़ी' गुलाम-लाकड़ी हमारा प्रिय शगल था. उस समय हम अपने वर्तमान में भी भूतकाल या प्राचीनकाल को जी रहे थे. हमारे आस-पास होने वाली किसी भी घटना के प्रति हमारी जिज्ञासाएं इतनी बढ़ जाती थी की कभी-कभी तो यह 'बिल्ली को ही मार देती थी'. हमने अपनी-अपनी यादों के 'डीप-फ्रिज' को इतना ज्यादा बड़ा कर लिया था कि जो कुछ भी हमें भविष्य में दस्तावेज़ की तरह अंकित करने के लायक लगता था उसे हम तुरन्त ही इस 'डीप-फ्रिज' में करीने से सजा देते थे. पर जो कुछ कहने लायक था उसे कहने की कोशिशों और नहीं कह पाने के दुःख के बीच करीब-करीब 5-6  साल निकल गए. इस दौरान लग गया था कि भीतर ही भीतर कुछ टूट रहा है. अन्दर ही अन्दर कुछ उबल रहा है. बतर्ज़ दुष्यंत कुमार कि
रक्त वर्षों से नसों में खौलता है,
आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना हैं !
और सच बात तो यह कि इस बनते जाने की पीड़ा और दौर में कुछ भी क्षणिक नहीं था.....भावावेश में नहीं हो रहा था. हम अपने-अपने गाँव और कस्बों को छोड़कर शहर आये थे और सोचते थे कि एक दिन हम वापिस अपने-अपने गाँव और कस्बों में लौटेंगे और सारे घर को बदल कर रख देंगे. पर हम नहीं जानते थे कि कुछ बनने और कोई मुकाम हासिल करने की जद्दोजहद में शहर ने हमको बदलना शुरू कर दिया था. हम आँखों में ख़वाब, दिल में उमंग और अपनी ज़िद के चलते अपने-अपने गाँव और कस्बों से निकल कर पढ़ने और जीवन में आगे बढ़ने के लिए बड़े शहरों में आ तो गए थे पर हम इस नयी आबोहवा में 'मिसफिट' थे. हम 'पीयर-प्रेसर' में झूठ पर झूठ बोलते चले जा रहे थे. हम जानते थे कि यह झूठ बोलना गलत है पर उस भीड़ में कुछ नहीं होने का 'टैग' हमसे ये गुनाह करवा ही लेता था. हम शहर की गलियों और कॉलेज के कोरिडोर में खुद के भविष्य को तलाश कर रहे थे. उस शहर में चाय की उस होटल पर एक चाय के बदले तीन अख़बार पढ़ने का लालच हमें चायवाले की गालियों और गुस्से को भी चाय के साथ पीना सिखा गया था. हम सब तरफ से नकारे जाने, ठुकराए जाने और दुत्कारे जाने के लायक थे. क्लास में सबसे पीछे की पंक्तियों में सबसे छुपकर बैठना और 'लो प्रोफाइल' में रहना हमारी नियति थी. इस प्रक्रिया में हम धीरे-धीरे कुछ और ही बन रहे थे. हम बोलना नहीं तो कम से कम सुनना तो सीख ही रहे थे. हम किसी बात को ढंग से 'कहना' नहीं जानते थे पर ढंग से 'पढ़ना' तो सीख ही रहे थे. हम अपनी सारी कोशिशों और बेवकूफियों के बाद ज्ञान की इस प्रारंभिक अवस्था को प्राप्त करने की तरफ अग्रसर थे कि हमें कुछ नहीं आता था. अपनी सारी अथक, अथाह, असीमित कोशिशों के बाद हम सिर्फ इतना सा जानने की तरफ बढ़ रहे थे कि हम कुछ नहीं जानते थे.
अगर मैं यह कहूँ की शहाबुद्दीन ने कहा था कि "नाम में क्या रखा हैं" तो आप तुरन्त भूल सुधार कर देंगे की यह शहाबुद्दीन ने नहीं बल्कि "शेक्सपियर" ने कहा हैं. यही तो मैं आपको समझाना चाहता हूँ कि आप शेक्सपियर के कहने पर मत जाइये और सीधा-सीधा मान लीजिए की नाम में बहुत कुछ रखा हैं. आप यदि शेक्सपियर के एक प्रसिद्ध वाक्य को किसी गुमनाम शख्स शहाबुद्दीन का नहीं मान सकते और तुरंत सही कर देते हैं तो इसी एक बात से साबित हो जाता हैं कि नाम मैं बहुत कुछ रखा हैं. और सच मैं हमारे नामों मैं बहुत कुछ रखा हुआ था. हम खानपुरा-श्रीनगर, हीरापुर, लाखेरी, लुहाकना खुर्द, देवली, नवलगढ़ जैसे गाँवों या कस्बों से निकले थे. हमारे महाविद्यालय के प्रवेश पत्रों मैं पते के नाम पर हमारे नाम के आगे गुर्जर मोहल्ला, घोसी मोहल्ला, चमार मोहल्ला, खटीक मोहल्ला, लिखा होना तय था. हम और कुछ समझे या नहीं समझे पर इतना समझ गए थे कि नाम में बहुत कुछ रखा हैं इसलिए हम अपनी पूरी कोशिश कर रहे थे कि हमारे पते मैं नाम के बाद इन मोहल्लों के बजाय साकेत कॉलोनी, पटेल नगर, शास्त्री नगर, तिलक नगर, प्रताप नगर जैसा ही कुछ लग जाये. हम सीधे-साधे जयराम, सियाराम, लालचंद, बजरंग, भगवान जैसे नामों के सरलीकरण से इतना दुखी थे कि हमने अपने बच्चों के नामों में एक तरह से भाषिक क्रांति ही कर दी थी. हमने अपनी बचकानी कोशिशों से बच्चों के नामों को आदित्य नीलाभ, अनुरिक्थ सुमन, अतीश, अदिति, जेनिल नुमा आभिजात्य की कीलों पर टांग दिया था. हमारे लिए अभीप्सित थोथा और खोखला अभिजात्य बोध हमें बदल रहा था और इतना होने के बाद भी हम क्यों इस कटु सच से अनभिज्ञ थे कि इन सब प्रपंचों से कुछ बदलने वाला नहीं था.
हम में से हर कोई अपने अधूरे प्यार और अपनी अतृप्त इच्छाओं को पाने को आतुर था. हम अपनी-अपनी आंखों में सपने, मन में ज़िद और जेब में गरीबी लिए शहर की सड़कों पर आवारा से डोल रहे थे. हम जिन भी शहरों मैं पढ़ने आये थे वहां अपनी असीमित इच्छाओं और स्वप्न संघर्षों की राह टटोल रहे थे. हम में से हर कोई किसी न किसी कामयाबी को छू लेना चाहता था. हम में से हर कोई कामयाब इन्सान बनकर गेरू-गोबर-कढ़ी-झीकरे और काली मिटटी से लिपे-पुते केलूपोश वाले कच्चे मकान के सामने बने उसी आंगन में वापस लौट जाना चाहता था, जहां हमारी नाळ गड़ी थी. क्या भ्रूण विज्ञान के सनातन सिद्धांतों के अनुसार जन्म के साथ ही मां के गर्भाशय व पिता के अंश का कुछ हिस्सा 'स्टेम सेल' के रूप में उस आँगन में गाड़ दिए गए 'प्लेसेंटा' में बाकी रह गया था जो हमें चीख-चीख कर वापिस उसी जगह आने के लिए पुकार रहा था कि "घर आजा परदेसी तेरी याद सताए रे". क्या हमारी क़िस्मत में अपने ही घर और गांवों-कस्बों में परदेशी बनकर लौटना लिखा था. वहां, जहाँ एक नहीं बल्कि कई आंखें हमारा इंतजार कर रही है कि हम आएंगे और उनके सारे दुख दर्द दूर कर देंगे. हम नोटों के थैले भर कर लाएंगे और उनकी दरिद्रता को समाप्त कर देंगे. हर एक नज़र हमसे उम्मीद करती थी. हर एक चेहरा हमसे आश्ना था.
हम अपने आधे-अधूरे सपनों के साथ जिंदगी में कुछ बेहतर पाने की जद्दोजहद में जितना हमसे हो सकता था उससे भी ज्यादा करने की कोशिश कर रहे थे. हम में से कुछेक जानते भी थे कि इतना लड़ने और जीतने की कोशिश करने के बाद हम हार जाएंगे क्योंकि हार जाना हमारी नियति होगी. हम जानते थे कि हजारों वर्षों से चली आ रही सामाजिक असमानता के कारण अपने साथ के प्रतिस्पर्धी से हम वैसे ही दो-चार पीढ़ी पीछे चल रहे थे. हम जानते थे कि अपने-अपने समय, समाज और सच को बदलने वाली मुहिम के हम अकेले योद्धा थे और यही अकेले खड़े होने और लड़ने की प्रवृति हमारे हारने का मुख्य कारण बनने वाली थी. हम जानते थे कि जिस दिन थके-टूटे-हारे हम जार-जार रोएंगे उस दिन कोई हमारे आंसू पोंछने नहीं आएगा. हम यह भी समझ गए थे कि हम जिस दिन उदास होंगे उस दिन कोई हमारे सिर पर हाथ फेरने के लिए नहीं आएगा. हम जानते थे कि कोई यदि जश्न मनाने के लिए हमारी सफलता का इन्तेज़ार कर रहा है तो कोई ऐसा भी है जो हाथ में नमक लेकर हमारे पराजित मन के फूटे हुए छालों के लिए प्रतीक्षातुर हैं. हम सफलता या सम्पन्नता के 4 गुणा 100 मीटर वाले 'रेसिंग ट्रेक' पर अपनी कोशिशों से पहले 'लैप' में सबसे आगे थे, पर यह नहीं जानते थे की आगे वाले 'लैप' के लिए हमारे हाथ से सपनों का 'बेटन' लेकर दौड़ने के लिए परिवार में से कोई खड़ा नहीं मिलेगा. हम इस दौड़ मैं आगे रहकर भी पिछड़ जाने का दंश भोग रहे थे. हम जानते थे कि शहरों में बस जाने के बाद भी हम गांव के उज्जड देशीपन को हमारी लाख कोशिशों के बाद भी अपने-अपने चेहरों से नहीं मिटा पाएंगे. आर्थिक अभावों और परिवार में सबसे ज्यादा पढ़े लिखे होने के तमगे ने हमें, हमारी ही शादी में 'दूल्हे' और 'दूल्हे के बाप' की दोहरी भूमिका मैं उतार दिया था, और हम ये 'डबलरोल' निभाकर भी दुखी थे. उस 'गर्वीली ग़रीबी' को झेलने के बाद हम अपने आप को इतना असुरक्षित महसूस करते थे कि हमने अपने-अपने जीवन साथी के चुनाव में सिर्फ़ और सिर्फ़ इस एक बात का पूरा ध्यान रखा था कि हमारे नहीं होने पर भी वह हमारे बच्चों को आराम से पाल सके. 'जितेन्द्र मारोटिया' के शब्दों में कहें तो हम 'मारूति कार के इन्जन' से पूरा 'मल्टीएक्स़ल ट्रोला' खींच रहे थे. हम गरीबी को इतना झेल चुके थे कि हम 'रिबेलियन' होने और देखने की हद तक उज्जड थे और हम जानते थे कि हमारी नेपथ्य वाली पृष्ठभूमि हमें कभी भी मंच पर नहीं आने देगी. हम जीवन और ज़माने के जलसाघर मैं परदे के पीछे छिप जाने के लिए अभिशप्त थे.
क्या हम अंततः लौट कर उस 'गुर्जर मोहल्ले' की उन्हीं गलियों या पगडंडियों में खो जायेंगे जहाँ कि कच्ची जमीं को सरकारी प्रक्रिया ने पहले सीमेंट गिट्टी और फिर गिट्टी-कोलतार में हमारे बचपन की यादों के साथ ही दफ़न कर दिया हैं. जहाँ पिछले बीस-पच्चीस सालों में ग़रीबी और बेरोज़गारी ने 'सत्यनारायण गुर्जर' जैसे गबरू जवानों को खोखले बूढों में तब्दील कर दिया हैं. क्या उस गुर्जर मोहल्ले के 'भवानीपुरा' और 'देवपुरा' के नामिक विभाजन अभी भी बदस्तूर वैसे ही बने होंगे. हम साहित्य को इतना आत्मसात कर लेंगे कि 'आधा गांव' के 'फुन्नन चा' को गुर्जर मोहल्ले के 'गुल्या कीर' में खोजते रह जाएंगे. यह कोई नहीं जानता कि हम जब यह जानेंगे कि हमारे साथ खेलने वाला कोई बचपन का साथी उसी क़स्बे में गुमनाम लाश की तरह जला दिया जायेगा तो हम पर क्या बीतेगी. कोई इस दर्द को महसूस नहीं कर पायेगा कि कैसा लगता होगा जब उस मौहल्ले की सबसे खूबसूरत लड़की को असमय ही हम एड्स से मरते देखेंगे. हमें पता ही नहीं चलता था कि हमारे साथ ही जासूसी उपन्यास पढ़ने वाला लड़का कैसे एक खूंखार हत्यारे में तब्दील हो जाता था. हममें से किसी ने भी ये सोचकर पैसे नहीं कमाये थे की एक दिन इन्ही पैसों से अपने ही बड़े या छोटे भाइयों के क्रियाकर्म का हिसाब-क़िताब करना होगा. हम अपनी इन सारी कोशिशों के बाद भी पराजित थे, पर परास्त नहीं थे. उस हत्यारे समय मैं भी हम थोड़े बहुत सनकी, आवारा, उज्जड, गाँवडैल, बिगडैल सब थे, पर हम ग़लत नहीं थे, बल्कि सही थे. सही होना ही हमारी नियति थी.
ऐसे वक्त में राजकीय महाविद्यालय आबुरोड के डॉक्टर लाहिरी बड़े याद आते हैं. 'डॉक्टर सत्यव्रत लाहिरी' मेरे जीवन में आये उन चुनिंदा व्यक्तियों में से एक थे जिनसे पार पाना आसान ही नहीं बल्कि नामुमकिन था.यह भी मनोविज्ञान और मानवीय स्वभाव का अटल सत्य है कि आप जिनसे पार नहीं पा सकते या तो आप उनके अनुयायी हो जाते हें या उनके विरोध में खड़े हो जाते हैं. जाहिर है उस दौर में मेरे जैसे अक्खड़ व्यक्ति ने दूसरा ही रास्ता चुना होगा. क्यों और कैसे इस पर फिर कभी. अभी सिर्फ इतना की डॉक्टर लाहिरी साहिब की बहुत सी बातों में से एक बात आज भी अक्सर याद आती है. वह अक्सर कहा करते थे कि "समाज कुत्ते की पूंछ की तरह होता है, आप कितनी भी कोशिश कर लो, चाहे 12 साल इसको नली में रख लो, पर समाज इतना ख़राब होता है कि आप 12 साल के बाद भी इसको उस नली से निकालोगे तो यह कुत्ते की पूछ की तरह टेढ़े का टेढ़ा ही निकलेगा. आप कितनी भी कोशिश कर लो यह समाज तो सुधरने वाली चीज नहीं है, यह सीधा हो ही नहीं सकता है" इतना कटु सत्य और अटल सत्य कहने के बाद लाहिरी साहिब ने अपने मोटे फ्रेम के चश्मे से झांकती शरारती आंखों से मुस्कुराते हुए कहा था "हां इतना तय है कि जो भी व्यक्ति समाज को सीधा करने की कोशिश में लगा रहता है, यह समाज सीधा हो या ना हो पर वह व्यक्ति हमेशा सीधा रहता है" हम भी इस वज़ह से सीधे थे क्योंकि सब को ठीक करने की अंतहीन कोशिश में लगे हुए थे. अभी भी लगे हुए हैं.
और कुछ हो या न हो पर अपने घर, परिवार, समय और समाज को सुधारने कि यह कोशिशें आज भी जारी है. इस ब्लॉग पर यह सब लिखना भी सब कुछ ठीक कर देने के प्रयासों का ही परिणाम हैं. सफलता मिले ये नहीं मिले ये वादा रहा कि पूरी ईमानदारी के साथ ऐसे ही आपसे इस ब्लॉग पर मुलाकात होती रहेगी और बहुत जल्दी-जल्दी और बार-बार होती रहेगी.
आमीन !